


एक तरफ़ देश में गौमाता को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने की माँग और प्रयास चल रहे हैं,
तो दूसरी तरफ़ ज़मीनी हकीकत यह है कि वही गौमाता सड़कों पर खुले कचरे से प्लास्टिक खाने को मजबूर है।
यह दृश्य सिर्फ़ एक तस्वीर या वीडियो नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम, हमारी संवेदनशीलता और हमारे दावों पर करारा तमाचा है।
यह दृश्य वलसाड शहर के सेशन कोर्ट के ठीक बगल में, वीणा ज़ेरॉक्स के सामने देखने को मिला, जहाँ खुले में पड़े कचरे के ढेर से एक गौमाता प्लास्टिक जैसी हानिकारक सामग्री खाते हुए नज़र आई।
गौवंश संरक्षण के नाम पर भाषण, पोस्टर और बयान तो बहुत हैं, लेकिन बेसहारा गौवंश के लिए न भोजन है, न सुरक्षा, न इलाज।
खुले में पड़ा प्लास्टिक गौमाता के लिए धीमा ज़हर है, जो पेट में जाकर गंभीर बीमारी और दर्दनाक मौत का कारण बनता है।
इसके बावजूद कचरा प्रबंधन की नाकामी, प्रशासन की चुप्पी और समाज की उदासीनता साफ़ नज़र आती है।
सवाल यह नहीं है कि गौमाता को क्या दर्जा दिया जाए,
सवाल यह है कि क्या हम उसे जीने लायक हालात दे पा रहे हैं?
अब ज़रूरत है—
* खुले में कचरा फेंकने वालों पर सख़्त कार्रवाई
* बेसहारा गौवंश को गौशालाओं तक पहुँचाने की ठोस व्यवस्था
* केवल नारों नहीं, जमीनी अमल की
वरना “राष्ट्रमाता” का दर्जा सिर्फ़ एक राजनीतिक नारा बनकर रह जाएगा।

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